Pahadi Pedallers Mango Ride:आम के बागों से हरेभरे रहे पुराने दून की यादों को ताजा कर गई ‘मैंगो राइड’

Rajesh Pandey
मैंगो राइड के दौरान झुरमुट वाटिका में लगी चौपाल में साइकिलिस्ट एवं अतिथि। ड्रोन फोटो- सार्थक पांडेय

Pahadi Pedallers Mango Ride: देहरादून, 05 जुलाई 2026ः आम का सीजन हो और पहाड़ी पैडलर्स आम पर बात न करें, ऐसा हो ही नहीं सकता। पहाड़ी पैडलर्स सिर्फ साइकिलों पर घुमक्कड़ी ही नहीं करते, बल्कि उत्तराखंड की लोक संस्कृति, खान-पान, ऐतिहासिक विरासत के लिए भी पैडल चलाते हैं। लंबी दूरियां चाहें सड़कों से हों या दुर्गम की पगडंडियों से हों या फिर कच्चे-पक्के रास्तों से होकर, जहां भी कुछ ऐसा दिखता है, जिसको बताने, दिखाने और सहेजने की जरूरत हो, पहाड़ी पैडलर्स की साइकिलें वहां पहुंच जाती हैं। इसलिए इनके पास प्रकृति, पर्यटन और पैडल्स की बहुत सारी कहानियां हैं। देहरादून में जलस्रोतों को उनके संरक्षण के लिए तलाश करने वाले पहाड़ी पैडलर्स इन दिनों दून पैडल टेल्स अभियान चला रहे हैं। कभी लीची और आम के बागों से भरपूर देहरादून की पुरानी यादों को ताजा कराने और उत्तराखंड की बागवानी पर बात करने का यह अभियान रविवार( पांच जुलाई, 2026) की सुबह थानों के पास झुरमुट वाटिका में पहुंचा। इस दौरान लगी चौपाल में आम की विविध किस्मों के साथ विशेष व्यंजन अमवाणी का स्वाद लिया गया।

आम का इतिहास, किस्से और चौपालों की परंपरा

Pahadi Pedallers Mango Ride:आसपास के इलाकों से लाए गए पके आमों का स्वाद लेने के लिए झुरमुट वाटिका में शानदार कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस मौके पर मैती आंदोलन के प्रणेता पद्मश्री से सम्मानित कल्याण सिंह रावत, टिहरी गढ़वाल के अपर जिलाधिकारी शैलेंद्र नेगी, सैर सलीका के संस्थापक डॉ. सर्वेश उनियाल, पर्यावरण से जुड़े मुद्दों के पैरोकार मोहित उनियाल सहित बड़ी संख्या में साइकिलिस्ट, जिनमें महिलाएं, बच्चे, युवा और बुजुर्ग भी शामिल हैं उपस्थित हुए। ‘पहाड़ी पैडलर्स’ के संस्थापक गजेंद्र रमोला ने आम के बारे में रोचक जानकारियां दीं। उनके अनुसार, भारत में आम का इतिहास और इसका सांस्कृतिक महत्व बहुत गहरा है। उनका कहना है कि देश में मुगलों के आगमन के साथ ही आम की कई बेहतरीन किस्मों और बागवानी को विशेष प्रोत्साहन मिला था। रमोला बताते हैं कि ऐतिहासिक दस्तावेजों और किस्सों के अनुसार, मुगल सम्राट अकबर ने अपने समय में बिहार में लगभग एक लाख आम के पेड़ों का एक विशाल बाग लगवाया था, जिसे ‘लाखी बाग’ के नाम से जाना जाता था। यह ऐतिहासिक तथ्य इस बात का पुख्ता प्रमाण है कि सदियों से यह खास फल न केवल आम जनता की पसंद रहा है, बल्कि शाही घरानों का भी बेहद चहेता रहा है।

आम की चर्चा को आगे बढ़ाते हुए रमोला मशहूर शायर मिर्ज़ा ग़ालिब का एक बेहद दिलचस्प किस्सा साझा करते हैं। वे बताते हैं कि एक बार ग़ालिब साहब के सामने एक गधा आम के छिलकों को बिना खाए आगे बढ़ गया, जिस पर उनके एक दोस्त ने तंज कसते हुए कहा, “देख लो, गधे भी आम नहीं खाते।” इस पर ग़ालिब ने अपनी मशहूर हाजिरजवाबी से पलटवार करते हुए कहा, “हाँ, जो गधे होते हैं, केवल वही आम नहीं खाते।” इसके अलावा, रमोला ने देश भर में पाई जाने वाली आम की ढेरों किस्मों का भी ज़िक्र किया, जिनमें सफ़ेदा, दशहरी, लंगड़ा, कलमी, तोतापरी, मल्लिका, सिंदूरी, मालदा, बम्बई और अचारी जैसी विविधताएं प्रमुख हैं, जो भारत की समृद्ध कृषि और भौगोलिक विविधता को दर्शाती हैं।

अपनी बात का समापन करते हुए रमोला ने आम की उन्नत तकनीकों और इससे जुड़ी ठेठ देशी परंपराओं पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने लखनऊ के मलिहाबाद और वहां के मशहूर ‘मैंगो मैन’ पद्मश्री कलीमुल्लाह खान का विशेष उल्लेख किया, जिन्होंने ग्राफ्टिंग तकनीक (कलम बांधना) के ज़रिए आम की कई अनोखी किस्में तैयार कर एक आम आदमी से पद्म श्री तक का सफर तय किया। पहाड़ी पैडलर्स के संस्थापक ने ग्रामीण जीवन की यादें ताज़ा करते हुए बताया कि बिजनौर जैसे कई इलाकों में आज भी बारिश के मौसम में बाल्टी में आम भिगोकर खाने की पुरानी परंपरा कायम है। यहां लोग आज भी चौपालों में एक साथ बैठकर ‘चूसने वाले आम’ का लुत्फ़ उठाते हैं और बाद में हंसी-मज़ाक के बीच गुठलियां गिनते हैं कि किसने सबसे ज़्यादा आम खाए।

पत्रकार राजेश पांडेय ने स्वरचित कहानी बोलने वाला पेड़ सुनाई। यह कहानी शहर से गांव पहुंचे क्लास एक में पढ़ने वाले बच्चे गिल्लू और उसके दादाजी के बाग में मौजूद आम के बूढ़े पेड़ पर केंद्रित है। कहानी में पेड़ और गिल्लू के बीच संवाद को असल जिंदगी के खास पहलुओं से जोड़ने की कोशिश की गई, जिसमें बताया गया कि पेड़ पर पत्थर बरसाकर गिराए जाने वाले आम उतने स्वादिष्ट नहीं होते, जितना कि पेड़ के खुद गिराकर दिए जाने वाले आमों का स्वाद होता है। पेड़ और गिल्लू के बीच संवाद उस समय इंसान और प्रकृति के बीच खास रिश्ते को उजागर करता है, जब पेड़ गिल्लू से कहता है, हम उसी से बोलते हैं, जो हमें समझता है।

पेड़ों की जीवंतता और संरक्षण की प्रेरक गाथा

विश्व विख्यात मैती आंदोलन के प्रणेता पद्मश्री कल्याण सिंह रावत ने एक प्रेरक घटना साझा की। उन्होंने बताया, “मैं अपनी एक छोटी सी घटना सुनाना चाहता हूं पेड़ पर। वो सच्ची घटना ये है, मैं उत्तरकाशी में राजगढ़ी रहता था। अध्यापक था। राजगढ़ी में बहुत पुराने जमाने में राजा का एक महल था। उसी पर हमारा आवास था। तो जब पहले-पहले मैं वहां गया तो 1987 की बात है। 1987 में इतना भयंकर सूखा पड़ा था पूरे उत्तराखंड में सारी फसलें चौपट हो गईं थीं। इतना भयंकर सूखा पड़ा था। तो रवांई जो इलाका है पूरा वहां, जहाँ मैं रहता था। वहाँ के लोगों ने कहा कि यहां सूखा पड़ा है, तो ये दैविक प्रकोप है, इसलिए हमें अपनी देव डोलियों को लेकर चारधाम यात्रा पर जाना चाहिए। उस इलाके के सारे लोग अपनी देवी डोलियों को लेकर के यात्रा पर चले गए। मई का महीना था, वो लौट करके आए, कोई बारिश नहीं।”

इसके बाद, उन्होंने उत्तराखंड केदर्दनाक घटनाक्रम ‘तिलाड़ी कांड’ का ज़िक्र किया, जिसे ‘उत्तराखंड का जलियांवाला कांड’ भी कहा जाता है। उन्होंने बताया कि 1930 में राजा ने रवांई जौनसार के लोगों के पेड़ काटने के अधिकार छीन लिए थे। इसका विरोध करने के लिए 30 मई 1930 को तिलाड़ी मैदान में सभा कर रहे निर्दोष लोगों पर राजा के दीवान ने गोलियाँ चलवा दीं, जिसमें 200 से ज़्यादा लोग मारे गए। 1987 में जब उन्होंने इस नरसंहार की याद में एक कार्यक्रम आयोजित करने का फैसला किया, तो उन्होंने इसे ‘वृक्ष अभिषेक’ नाम दिया। उन्होंने लोगों को प्रेरित किया कि अपने-अपने गाँवों से पेड़ और जल कलश लेकर आएँ। उन्होंने बताया, “30 मई को हम राजगढ़ी में पहुंचे। मैंने स्कूल में वहां पर एक मंच बनाया था और वहां पर उनके कार्यक्रम भी तैयार किए। आपको ताज्जुब होगा कि सारे गांव के लोग ढोल दमाऊ लेकर, पेड़ लेकर, नारे लगाते हुए, महिलाएं भी वहां राजगढ़ी पहुंच गईं।”

मैंगो राइड के दौरान चौपाल में साइकिलिस्ट और अतिथि।

भाषण के अंतिम हिस्से में उन्होंने प्रकृति के चमत्कार का वर्णन किया। उन्होंने बताया कि उस कार्यक्रम के दौरान, अचानक बारिश शुरू हो गई। “कहाँ से रात को बादल आ गए और एकदम बारिश आने लगी और आपको ताज्जुब होगा वो बारिश सात दिन तक लगातार चलती रही।” लोगों ने इसे उन लड़कियों द्वारा जल कलश से पेड़ों पर चढ़ाए गए पानी का परिणाम माना। “ये मेरे जीवन की सबसे बड़ी घटना थी जिसने कहा कि वास्तव में प्रकृति… प्रकृति सब जानती है सब करती है और आज वहां आप राजगढ़ी जाएंगे वो पेड़ बहुत बड़े हो गए हैं और एक वहां खूबसूरत जंगल बना है।” उन्होंने अपने भाषण का समापन प्रकृति की वंदना के साथ किया, “वास्तव में दुनिया में हम कहते हैं ये भगवान और ये कुछ नहीं है, साक्षात भगवान यही हैं जो हमें ऑक्सीजन दे रहे हैं, साक्षात भगवान यही हैं जो हमें पानी दे रहे हैं, हमें आश्रय दे रहे हैं।”

आम से जुड़ीं बचपन की यादें

टिहरी गढ़वाल के अपर जिलाधिकारी शैलेंद्र नेगी ने गढ़वाल के पहाड़ी क्षेत्रों में आम के पेड़ों से जुड़ीं अपनी बचपन की यादें ताज़ा कीं। उन्होंने बताया कि उन इलाकों में पाए जाने वाले आम ज़्यादातर प्राकृतिक रूप से उगे हुए और रेशेदार होते हैं। गाँव में अपनी शरारतों का भी ज़िक्र किया, जहाँ वे मंदिर के आसपास लगे पेड़ों से आम तोड़ा करते थे, और उन्हें ‘मथरा माई’ से डर लगता था। उन्होंने कहा कि बचपन की वे बातें अब एक सुखद याद बन गई हैं, लेकिन आज उन्हें एहसास होता है कि पेड़ प्रकृति की अनमोल देन थे और हमें उनका सम्मान करना चाहिए था।

इसके साथ ही, उन्होंने वर्तमान समय में तेज़ी से हो रहे शहरीकरण और मानव बस्तियों के विस्तार पर गंभीर चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि शहरों के विकास के कारण कई फलों और बिना फलों वाले पेड़ काटे जा रहे हैं, जो एक बड़ी चुनौती है। हमें केवल आम या अन्य फलों के पेड़ों का लुत्फ़ उठाने तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए इन पेड़ों का संरक्षण और पौधारोपण भी करना चाहिए। उन्होंने सुझाव दिया कि हमें खाली पड़ी जगहों पर नए पेड़ लगाने चाहिए, ताकि प्राकृतिक संतुलन बना रहे। अपर जिलाधिकारी नेगी ने कहा, हमें केवल मैंगो राइड का आनंद लेने तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि पर्यावरण संरक्षण की ज़िम्मेदारी भी उठानी चाहिए। उन्होंने यह भी बताया कि इस मैंगो राइड कार्यक्रम के बाद वन विभाग के सहयोग से सड़क किनारे पौधारोपण किया जाएगा। उन्होंने सभी से आग्रह किया कि वे इस मुहिम का हिस्सा बनें और प्रकृति को संरक्षित करने में अपना योगदान दें, क्योंकि तभी भविष्य की पीढ़ियाँ इन फलों और प्राकृतिक संसाधनों का आनंद ले पाएंगी।

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मैंगो राइड सार्थक पहल

पर्यावरण से जुड़े मुद्दों के पैरोकार मोहित उनियाल ने कहा, पहाड़ी पैडलर्स पर्यावरण से जुड़े मुद्दों पर राइडिंग के माध्यम से जागरूकता की अलख जगा रहा है। जल स्रोतों के संरक्षण की पहल करना, खत्म होते जा रहे जुगनूओं पर बात करना, उत्तराखंड की बागवानी पर राइडिंग करना, प्रकृति के साथ जुड़े रहने का आह्वान करना ये कुछ ऐसे कदम हैं, जो पहाड़ी पैडलर्स को सबसे अलग बनाते हैं।

पुराने दून की कहानियों को सहजने का प्रयास

पहाड़ी पैडलर्स के संस्थापक सदस्य अनुज केडियाल बताते हैं, हर रविवार पहाड़ी पैडलर्स दून की विरासत को सहेजने के साथ ही पर्यावरण से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर राइडिंग करते हैं। वर्तमान में दून पैडल टेल्स अभियान चल रहा है, जिसके तहत हम उत्तराखंड की बागवानी के प्रति जागरूक कर रहे हैं। देहरादून में एक समय में आम और लीची के बागों की भरमार थी, पर समय के साथ हालात बदले हैं। हम दून की पुरानी कहानियों को सहेजने की कोशिश कर रहे हैं।

इस कार्यक्रम के आयोजन में झुरमुट वाटिका के संचालक संजय डोभाल का महत्वपूर्ण सहयोग रहा। वरिष्ठ पत्रकार संदीप गुसाईं, श्रावणी गुसाईं, सार्थक पांडेय, शुभम कांबोज बतौर अतिथि शामिल हुए, वहीं चांदिनी अरोड़ा एवं सौरभ नेगी के निर्देशन में रेहान सिद्दीकी, देवांश, सौरभ पसबोला, राजेंद्र सिंह, प्रभजोत सिंह, नितिन क्षेत्री, अरुण कुमार, लक्ष्मण सिंह, देबू थापा, अशोक लिम्बु, अक्षत बर्थवाल, बंटू राइडर, अब्दुल रऊफ, दीपक मित्तल, राजेश सिंह, अनीश रावत, किरण रावत, कुंवर रावत, ओम रावत, विष्णु रावत, विकास उनियाल, गजेंद्र रमोला, देवेंद्र सिंह रावत, संजय, सौरभ नेगी, , राजेश रौथाण, गोपाल राणा, अनूप ओझा, श्रद्धेय, प्रदीप नेगी राइडिंग करते हुए देहरादून से थानो पहुंचे।

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newslive24x7.com टीम के सदस्य राजेश पांडेय, उत्तराखंड के डोईवाला, देहरादून के निवासी और 1996 से पत्रकारिता का हिस्सा। अमर उजाला, दैनिक जागरण और हिन्दुस्तान जैसे प्रमुख हिन्दी समाचार पत्रों में 20 वर्षों तक रिपोर्टिंग और एडिटिंग का अनुभव। बच्चों और हर आयु वर्ग के लिए 100 से अधिक कहानियां और कविताएं लिखीं। स्कूलों और संस्थाओं में बच्चों को कहानियां सुनाना और उनसे संवाद करना जुनून। रुद्रप्रयाग के ‘रेडियो केदार’ के साथ पहाड़ के गांवों की अनकही कहानियां लोगों तक पहुंचाईं और सामुदायिक जागरूकता के लिए काम किया। रेडियो ऋषिकेश के शुरुआती दौर में लगभग छह माह सेवाएं दीं। ऋषिकेश में महिला कीर्तन मंडलियों के माध्यम से स्वच्छता का संदेश दिया। जीवन का मंत्र- बाकी जिंदगी को जी खोलकर जीना चाहता हूं, ताकि बाद में ऐसा न लगे कि मैं तो जीया ही नहीं। शैक्षणिक योग्यता: बी.एससी (पीसीएम), पत्रकारिता स्नातक, एलएलबी संपर्क: प्रेमनगर बाजार, डोईवाला, देहरादून, उत्तराखंड-248140 ईमेल: rajeshpandeydw@gmail.com फोन: +91 9760097344
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