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Economic value of pollination in India: अगर मधुमक्खियां न हों, तो खेतीबाड़ी को होगा हजारों करोड़ों का नुकसान

Economic value of pollination in India: नई दिल्ली, 18 मार्च, 2026ः  भारत में परागण करने वाले जीवों (Pollinators) की भारी विविधता है। यहाँ मधुमक्खियों की 800 से ज्यादा किस्में हैं। इसके अलावा तितलियाँ, चमगादड़, पक्षी और भृंग (Beetles) भी फसलों को फलने-फूलने में मदद करते हैं।

वैज्ञानिक अब यह माप रहे हैं कि इन जीवों की “फ्री सर्विस” की कीमत कितनी है। पिछले 10 सालों में खेती में इनका योगदान ₹115 हजार करोड़ से बढ़कर ₹266 हजार करोड़ तक पहुँच गया है। हमारी कुल फसल पैदावार की कीमत का 8% से 10% हिस्सा सीधे तौर पर इन नन्हे जीवों की मेहनत की वजह से है।

Economic value of pollination in India: परागण का सबसे ज्यादा फायदा फलों और सब्जियों को मिलता है। चूंकि इनका बाजार भाव ज्यादा होता है और ये जीव इनके उत्पादन में मुख्य भूमिका निभाते हैं, इसलिए इन जीवों का आर्थिक महत्व और बढ़ जाता है। जब हम यह जान जाते हैं कि ये जीव हमारी अर्थव्यवस्था को अरबों का फायदा पहुँचा रहे हैं, तो सरकारों के लिए इनके संरक्षण की नीतियां बनाना आसान हो जाता है। इससे कीटनाशकों के संभलकर इस्तेमाल, इनके प्राकृतिक घरों (आवास) को बचाने और टिकाऊ खेती को बढ़ावा देने में मदद मिलती है।

सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय(एमओएसपीआई) ने 2018 में संयुक्त राष्ट्र की पर्यावरण-आर्थिक लेखा प्रणाली (एसईईए) फ्रेमवर्क को अपनाया, जो पर्यावरण आर्थिक खातों के संकलन के लिए एक सहमत अंतरराष्ट्रीय ढांचा है।

Economic value of pollination in India:  आमतौर पर किसी देश की प्रगति को ‘जीडीपी’ (GDP) से मापा जाता है, जिसमें केवल पैसों का लेन-देन दिखता है। लेकिन SEEA (System of Environmental-Economic Accounting) एक ऐसा अंतरराष्ट्रीय तरीका है, जिससे यह मापा जाता है कि हमारी अर्थव्यवस्था में प्रकृति (नदियों, जंगलों, जीवों) का कितना बड़ा आर्थिक योगदान है। भारत ने इसे 2018 में अपनाया था।

आज 18 मार्च 2026 को पटना में एक विशेष वर्कशॉप हुई। इसमें सरकार ने “पर्यावरण लेखांकन व्याख्या श्रृंखला: परागण सेवाएं” नाम की एक ऐतिहासिक रिपोर्ट जारी की। यह भारत का पहला ऐसा समर्पित दस्तावेज़ है, जो यह बताता है कि मधुमक्खियां और अन्य जीव (Pollinators) मुफ्त में जो परागण करते हैं, उसका देश की अर्थव्यवस्था के लिए कितना महत्व है।

इस रिपोर्ट के मुख्य उद्देश्य खेती में कीटों के योगदान को आंकड़ों में दर्ज करना, यह समझना कि पर्यावरण को बचाकर ही हम लंबे समय तक सतत विकास कर सकते हैं। साथ ही, भविष्य में खेती और पर्यावरण से जुड़ी योजनाएं बनाने के लिए सटीक डेटा (आंकड़े) उपलब्ध कराना है।

परागण (Pollination) केवल एक प्राकृतिक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह खेती की नींव है। अच्छी तरह से परागण होने से न केवल फसल ज्यादा होती है, बल्कि फल और बीज भी बेहतर बनते हैं। इसके कारण कृषि उत्पादों का स्वाद, आकार और पोषक तत्व बेहतर होते हैं।

पहले जब हम खेती का हिसाब लगाते थे, तो हम सिर्फ बीज, खाद, पानी और मेहनत का खर्चा जोड़ते थे। हम यह भूल जाते थे कि मधुमक्खियां, पक्षी और चमगादड़ जो मुफ्त में काम कर रहे हैं, उनकी “सर्विस” की कीमत क्या है।

अब सरकार इस ‘अदृश्य सेवा’ का भी मूल्य निर्धारित कर रही है। इससे पता चलता है कि अगर ये जीव न हों, तो हमें कितना बड़ा आर्थिक नुकसान होगा। सांख्यिकी मंत्रालय (MoSPI) ने जो नया अंतरराष्ट्रीय ढांचा (SEEA) अपनाया है, वह हमें तीन चीजों के बीच का संबंध समझने में मदद करता है, जिनमें पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) यानी स्वस्थ प्रकृति और जीव, कृषि उत्पादन यानी हमारी फसलें तथा आर्थिक विकास यानी देश की जीडीपी और कमाई शामिल हैं।

यह रिपोर्ट बताती है कि ये 800+ प्रकार की मधुमक्खियाँ, तितलियाँ और चमगादड़ सिर्फ प्रकृति की सुंदरता नहीं हैं, बल्कि वे सतत विकास लक्ष्यों (SDG) को पूरा करने में मदद करते हैं, जिससे अच्छी फसल मतलब सबके लिए भोजन होगा। किसानों की पैदावार बढ़ेगी तो गरीबी कम होगी तथा ये जीव पर्यावरण को बदलते मौसम के खिलाफ मजबूत बनाते हैं।

वैज्ञानिकों ने एक बहुत ही सटीक तरीका अपनाया है जिसे ‘उत्पादकता-आधारित दृष्टिकोण’ कहते हैं। इसे आप एक उदाहरण से समझें। मान लीजिए एक सेब के बाग में 100 किलो सेब होते हैं। वैज्ञानिकों ने रिसर्च की कि अगर वहाँ मधुमक्खियाँ न हों, तो सिर्फ 40 किलो ही सेब होंगे। इसका मतलब है कि 60 किलो सेब ‘परागण सेवा’ की देन हैं। अब उस 60 किलो सेब की जो बाजार में कीमत है, वही उस मधुमक्खी की मेहनत का ‘मौद्रिक मूल्य’ (Monetary Value) है।

अक्सर सरकारें और नीतियां केवल उन चीजों पर ध्यान देती हैं जिनका हिसाब पैसों में (जैसे GDP) होता है। इस प्रकाशन ने ‘प्राकृतिक प्रक्रिया’ (परागण) को ‘आर्थिक संकेतक’ (रुपयों) में बदल दिया है। अब जब बजट बनेगा या नई सड़क/फैक्ट्री के लिए जंगल काटने की बात होगी, तो अधिकारी कागजों पर देख सकेंगे कि “यहाँ के कीड़े-मकोड़े हमें सालाना इतने करोड़ का फायदा दे रहे हैं, इन्हें बचाना जरूरी है।”

परागण (Pollination) केवल एक प्राकृतिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि भारत की खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था का एक मजबूत स्तंभ है। इसे आसान शब्दों में इस प्रकार समझा जा सकता है।

2012-13 से 2021-22 के आंकड़ों के अनुसार, कुछ खास फसलों की पैदावार में परागणकर्ताओं का बहुत बड़ा हाथ है। तिलहन की पैदावार का लगभग 27% से 32% हिस्सा परागण की वजह से है। यानी अगर मधुमक्खियां न हों, तो हमारे खाने के तेल के उत्पादन में भारी गिरावट आ जाएगी। रेशे वाली फसलें (Fibers जैसे कपास की यहां निर्भरता 22% से 23% है। स्रोतः पीआईबी

Rajesh Pandey

newslive24x7.com टीम के सदस्य राजेश पांडेय, उत्तराखंड के डोईवाला, देहरादून के निवासी और 1996 से पत्रकारिता का हिस्सा। अमर उजाला, दैनिक जागरण और हिन्दुस्तान जैसे प्रमुख हिन्दी समाचार पत्रों में 20 वर्षों तक रिपोर्टिंग और एडिटिंग का अनुभव। बच्चों और हर आयु वर्ग के लिए 100 से अधिक कहानियां और कविताएं लिखीं। स्कूलों और संस्थाओं में बच्चों को कहानियां सुनाना और उनसे संवाद करना जुनून। रुद्रप्रयाग के ‘रेडियो केदार’ के साथ पहाड़ के गांवों की अनकही कहानियां लोगों तक पहुंचाईं और सामुदायिक जागरूकता के लिए काम किया। रेडियो ऋषिकेश के शुरुआती दौर में लगभग छह माह सेवाएं दीं। ऋषिकेश में महिला कीर्तन मंडलियों के माध्यम से स्वच्छता का संदेश दिया। जीवन का मंत्र- बाकी जिंदगी को जी खोलकर जीना चाहता हूं, ताकि बाद में ऐसा न लगे कि मैं तो जीया ही नहीं। शैक्षणिक योग्यता: बी.एससी (पीसीएम), पत्रकारिता स्नातक, एलएलबी संपर्क: प्रेमनगर बाजार, डोईवाला, देहरादून, उत्तराखंड-248140 ईमेल: rajeshpandeydw@gmail.com फोन: +91 9760097344

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