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मां

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कान्ता घिल्डियाल

सिर पर अधपके खिचड़ी बाल
और चेहरे पर
झुर्रियों का मकड़जाल लिए
‘साहेब’ बेटों की बूढ़ी माँ
अक्सर नीरव अंधकार में
अकेले बतियाती हैmother
मूक देवी-देवताओं से…
भोर होते ही, आँख खुलने पर
अश्रुओं से नहलाती है
देव-प्रतिमाओं को,….
और दिनभर
व्याकुल यशोदा माँ सी
टटोलते हुए
नटखट कान्हा के
नन्हें वस्त्रों को,
याद करती है
पूत के बचपन के झंकृत करते मीठे बोल….
स्तब्ध गोधूलि में पुनः
थकी, बूढी देह को समेटकर
फिर से बन जाती है
पेड़ की टहनी सी वो
और उसके हिलने से
झरने लगते हैं आशीष-पुष्प
उसे भूल चुके बेटे-बहुओं के लिए……

  • कान्ता घिल्डियाल

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राजेश पांडेय, देहरादून (उत्तराखंड) के डोईवाला नगर पालिका के निवासी है। पत्रकारिता में  26 वर्ष से अधिक का अनुभव हासिल है। लंबे समय तक हिन्दी समाचार पत्रों अमर उजाला, दैनिक जागरण व हिन्दुस्तान में नौकरी की, जिनमें रिपोर्टिंग और एडिटिंग की जिम्मेदारी संभाली। 2016 में हिन्दुस्तान से मुख्य उप संपादक के पद से त्यागपत्र देकर बच्चों के बीच कार्य शुरू किया।   बच्चों के लिए 60 से अधिक कहानियां एवं कविताएं लिखी हैं। दो किताबें जंगल में तक धिनाधिन और जिंदगी का तक धिनाधिन के लेखक हैं। इनके प्रकाशन के लिए सही मंच की तलाश जारी है। बच्चों को कहानियां सुनाने, उनसे बातें करने, कुछ उनको सुनने और कुछ अपनी सुनाना पसंद है। पहाड़ के गांवों की अनकही कहानियां लोगों तक पहुंचाना चाहते हैं।  अपने मित्र मोहित उनियाल के साथ, बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से डेढ़ घंटे के निशुल्क स्कूल का संचालन कर रहे हैं। इसमें स्कूल जाने और नहीं जाने वाले बच्चे पढ़ते हैं। उत्तराखंड के बच्चों, खासकर दूरदराज के इलाकों में रहने वाले बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से ई पत्रिका का प्रकाशन करते हैं।  बाकी जिंदगी की जी खोलकर जीना चाहते हैं, ताकि बाद में ऐसा न लगे कि मैं तो जीया ही नहीं। शैक्षणिक योग्यता - बी.एससी (पीसीएम), पत्रकारिता स्नातक और एलएलबी, मुख्य कार्य- कन्टेंट राइटिंग, एडिटिंग और रिपोर्टिंग

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